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मिथिला के लोग बिहार दिवस के काला दिवस कियैक मानैत अछि, आबू बुझू .

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     22 मार्च कए हर साल मनाओल जाय वाला बिहार दिवस बिहार राज्य क गठन क याद मे मनाउल जाइत अछि।  जखन कि पूरा बिहार मे बहुतो के लेल ई एकटा महत्व के दिन अछि, मिथिला के लोक के लेल एकर एकटा अलग अर्थ अछि- विलाप आ शोक के।  बिहार दिवस के मिथिला के लेल ब्लैक डे के रूप में नामांकन ऐतिहासिक शिकायत, सांस्कृतिक असमानता, आ एहि प्राचीन क्षेत्र के निवासी के हाशिया पर राखय के भाव स उपजल अछि |       मिथिला, जेकरा तिरहुत के नाम स॑ भी जानलऽ जाय छै, उत्तरी भारत केरऽ ऐतिहासिक क्षेत्र छेकै, जेकरा म॑ मुख्य रूप स॑ बिहार केरऽ उत्तरी भाग आरू नेपाल केरऽ एगो छोटऽ हिस्सा शामिल छै ।  ई समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के घमंड करै छै, जे अपनऽ विशिष्ट कला, साहित्य, आरू परंपरा लेली प्रसिद्ध छै ।  मुदा, अपन सांस्कृतिक महत्वक बादो मिथिला प्रायः बिहारक राजनीति आ प्रशासनक व्यापक ढाँचा मे अपना केँ उपेक्षित आ किनार पाबि गेल अछि।  मिथिलाक लोक बिहार दिवस केँ तिरस्कारक दृष्टि सँ देखबाक एकटा प्राथमिक कारण अछि राज्यक गठन केँ घेरने ऐतिहासिक संदर्भ।  22 मार्च 1912 कए ब्रिटिश शासन काल ...

नहाय खाय : छठि पूजाक पहिल पड़ाव. LiveAbhinash

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               बिहार, झारखंड आरू उत्तर प्रदेश केरऽ कीछ हिस्सा म बहुत उत्साह स मनाबै जाय वला पर्व छठ सूर्य देव आरू हुनकऽ पत्नी उषा, भोरक देवी केरऽ अनूठा स्तोत्र अछि। ई पावनि चारि दिनक होइत अछि, जाहि मे प्रत्येक दिन अलग-अलग संस्कार सँ चिन्हित होइत अछि आ पहिल दिन, जे नहाय खाय के नाम सँ जानल जाइत अछि, आकाशीय पिंडक एहि विस्तृत पूजाक मंच तैयार करैत अछि | नहाय खाय नहाय खाय, जकर अर्थ "स्नान क के खाउ" होइत अछि, छठ पूजाक उत्सवक पहिल दिन मनाओल जाइत अछि | भक्त, मुख्य रूप सं महिला, भोर सं पहिने जागि क नदी, पोखरि या अन्य जल निकाय मे संस्कारात्मक सफाई करैत अछि. ई संस्कार अगिला तीन दिन मे होबय बला पवित्र पूजा के तैयारी मे शरीर आ आत्मा दुनू के शुद्धि के प्रतीक अछि | आध्यात्मिक स्नान सूर्यक पहिल किरण जेना-जेना परिदृश्य केँ धीरे-धीरे रोशन करैत अछि, भक्त लोकनि शीतल, बहैत पानि मे डूबि जाइत छथि | ई संस्कार स्नान मात्र शारीरिक शुद्धि नहिं थिक; ई मन आ आत्मा के शुद्ध करय के प्रतीकात्मक क्रिया अछि | निश्चिंत परिवेश आ शुद्ध, बहैत जलक स्पर्श सँ उपासक...

दियाबाती यानी दिबाली मनेबाक मैथिली कंसेप्ट। Liveabhinash

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  (All copyrights are reserved via Liveabhinash) दियाबाती यानी दिबाली मनेबाक मैथिली कंसेप्ट :   राजन झा हिन्दी सिनेमा, हिन्दी चैनल आ हिन्दी माध्यमक किताब पढ़ि बहुत रास मैथिली भाषी दियाबाती मनेबाक पाछू राम आ राबण बला कंसेप्ट लैत छै। यानी राबण पर रामक बिजय उपरान्त राम केँ अयोध्या घुरि एबाक कंसेप्ट। मुदा दिबाली मे मैथिल सभक रीति जेना यम दीप जराएब, हुक्का पाती खेलब (उक फेरब), दियाबाती केर भिनसर मे डगरा पीटब, अगिला दिन माल जाल केर चुमान करब राम बला कंसेप्ट सँ मेल नै खाइ छै। सच कही तऽ राम बला कंसेप्ट मूलतः बैष्णव कंसेप्ट छै। मिथिला शाक्त बहुल क्षेत्र रहबाक कारणसँ एतय ना दशमी यानी दुर्गपूजा मे राम छै ना दियाबाती मे राम छै।  (Source : Wekipedia) मिथिला क्षेत्र मे दियाबाती शाक्त कंसेप्ट सँ मनाएल जाइ। मिथिला केर दियाबाती देवी कालीक जन्म लय नरकासुर नाओक राक्षस केर बध कय सौंसे  जगत कल्याण करब पर छै। (Source : Redbubble, ABS orignals) नरकासुर राक्षस केर उत्पात सँ अपन परिजनक अकाल मृत्यु सँ बचाव लेल यम केर दीप जराएल जाइ छै पहिल दिन। आ दोसर दिन देवी काली द्वारा जन्म लय नरकासुर नाओक ...

पहिचानक सार केर आत्मसात केनाय : मातृभाषाक महत्व जानू । मातृभाषा मैथिलि | Advik

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  परिचय भाषा एकटा सशक्त औजार छै जे हमरा सब के अपन संस्कृति, धरोहर, आ पहचान स जोड़ै छै। विश्व भरि मे बाजल जायवला असंख्य भाषा मे हमर मातृभाषा एकटा विशेष स्थान रखैत अछि । ई खाली संवादक साधन नहिं थिक; ई हमरऽ जड़ के प्रतीक छै आरू हमरऽ विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत के प्रतिबिंब छै । एहि लेख मे हम अपन मातृभाषाक गहींर महत्व आ हमर पहिचान केँ आकार देबा मे एकर अनिवार्य भूमिका कोना होइत छैक ताहि पर अन्वेषण करब। पहचान के सार अहाँक मातृभाषा मात्र ओहि भाषा सँ बेसी अछि जे अहाँ पहिने सीखलहुँ; ई एकटा मौलिक अंग अछि जे अहाँ के छी। ई ओ भाषा अछि जाहि मे अहाँ अपन माता-पिताक लोरी पहिल बेर सुनने रही, जाहि भाषा मे अहाँ अपन पहिल शब्द व्यक्त केने रही, आ ओ भाषा अछि जे अहाँक पूर्वजक कथा, परंपरा, बुद्धि केँ वाहक अछि। सार मे अहाँक मातृभाषा ओ पात्र अछि जे अहाँक सांस्कृतिक धरोहर केँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी ढोबैत अछि । सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण भाषा संस्कृतिक भंडार थिक। एक पीढ़ी स॑ दोसरऽ पीढ़ी म॑ चलै वला मूल्य, रीति-रिवाज, आरू परंपरा के मूर्त रूप दै छै । जखन हम सब अपन मातृभाषा बजैत छी त' खाली संवाद नहि क' रहल छी; हम ...

हिन्दू नव वर्ष | 2070

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           Ankit Kumar Roy : हिन्दू नव वर्ष जेकरा "विक्रम संवत" के नाम स सेहो जानल जाएय छै, भारत आरू दुनियाक अन्य भाग म हिन्दू समुदाय द्वारा बहुत उत्साह आरू हर्षक साथ मनाबल जाएत अछि । हिन्दू कैलेंडर चन्द्र चक्रक पालन करैत चि, जेकर मतलब अछि जे हर सालक शुरुआत निश्चित नै होय छै बल्कि साल दर साल अलग अलग होएत छैक । हिन्दू चन्द्र पंचांगक अनुसार चैत्र मासक पहिल दिन नव वर्ष शुरू होइत अछि, जे प्रायः मार्चक अंत या अप्रैलक प्रारंभ म होइत अछि । हिन्दू नव वर्ष नव शुरुआत आ नव शुरुआत के समय अछि, कियाक त लोक आशावाद आ आशाक संग आगामी सालक इंतजार करैत छथि। ई पारिवारिक जुटान, उत्सव, आ धार्मिक अनुष्ठानक समय छै । ई दिन संस्कार, प्रार्थना, आरू उत्सवक साथ मनाबल जाएत चि, जे क्षेत्रक क्षेत्र आरू समुदायक अनुसार अलग अलग होएत अछि । हिन्दू नव वर्षक एगो महत्वपूर्ण उत्सव महाराष्ट्र राज्य म होय छै, जहां एकरा "गुड़ी पदवा" के नाम स जानल जाएत अछि । एहि दिन लोक घरक बाहर बाँसक खंभा पर "गुड़ी" झंडा जे फूल सँ सजल चमकैत पीयर वा केसरक कपड़ा होइत अछि, फहरबैत छथि । ई झंडा आबै वाला सालक लेल शुभक...

राजीव रंजन : मैथिलि म्यूजिक उद्योगक नव उद्धारक | Liveabhinash

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 राजीव रंजन : मैथिलि म्यूजिक उद्योगक नव उद्धारक  | Liveabhinash           Ankit Kumar Roy : राजीव रंजन हालहि मे अपन नवीनतम हिट गीत "एबई जे गोरी हमर मिथिला मे" स संगीत जगत म सनसनी बनि गेल छथि। ई युवा गायक अपन सुमधुर आवाज आ आत्मानुभूति भरल गीत सँ सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्रक हृदय पर कब्जा कएने छथि । राजीव रंजन भारतक बिहारक मिथिला क्षेत्रक रहय वला छथिन्ह जे अपन समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर आओर पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग के लेल प्रसिद्ध अछि | एहि जीवंत क्षेत्र मे पलल-बढ़ल राजीव स्थानीय लोक संगीत आ नृत्य रूप स परिचित छलाह, जेकर गहींर प्रभाव हुनकर संगीत यात्रा पर पड़ल । लोकक अनुसार बचपन मे राजीव संगीत दिस आकर्षित होइत छलाह आ प्रायः स्थानीय सांस्कृतिक आयोजन आ प्रतियोगिता मे भाग लैत छलाह । हुनकर मेहनत आ दृढ़ताक फल आखिरकार तखन भेटल जखन ओ अपन नवीनतम गीत "एबई जे गोरी हमर मिथिला में" रिलीज केलनि। मिथिला क्षेत्रक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरक श्रद्धांजलि देबय वला ई गीत स्थानीय लोकक एकटा तार ठोकि देलक अछि, जे एकरा तन-मन-धन सं अपना लेलक अछि |  अपन नवीनतम हिट ...

अन्य भारतीय भाषा सब पर हिन्दी थोपनाय बंद करू | Liveabhinash

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अन्य भारतीय भाषा सब पर हिन्दी थोपनाय बंद करू | Liveabhinash            Ankit Kumar Roy : भारत एकटा विविध देश अछि जेकर आपन एगो  समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर छैक आरू ई विविधता देश भर म बोललऽ जाय वला भाषाक विस्तृत श्रृंखला म परिलक्षित होएत अछि | हिन्दी भारतक राजभाषा म स एकटा छैक मुदा अन्य क्षेत्रीय भाषा प एकरा थोपनाय बहुत साल स बहस आरू चर्चाक विषय रहलऽ छैक | हिन्दी थोपबाक मुद्दा तखन उठैत अछि जखन स्कूल, सरकारी कार्यालय, आ सार्वजनिक स्थान पर हिन्दी अनिवार्य कयल जाइत अछि, ओहो ओहि क्षेत्र मे जतय ई प्राथमिक भाषा नहि अछि | एकरा अन्य क्षेत्रीय भाषाक हशिया पर राखि भारत में हिन्दीक प्रबल भाषाक रूप म थोपबाक प्रयासक रूप मे देखल जा सकैत अछि |  हिन्दी थोपलाक पक्ष म एकटा मुख्य तर्क ई थिक जे ई राष्ट्रीय एकीकरण आरू एकताक बढ़ावा दै म मदद करी सकैत छैक | हिन्दीक समर्थक के तर्क छैन जे ई एगो साझा भाषा छैक जेकरऽ उपयोग अलग अलग क्षेत्रऽक बीच भाषाई विभाजनक दूर करै लेल आरू राष्ट्रीय पहचानक भाव पैदा करैम मदद करै लेल करलऽ जा सकैत छैक | मुदा ई तर्क ई तथ्यक अन...

संगीत भाइलोग : मैथिली संगीत उद्योग मे सफलताक अपन रास्ता बनेनिहार युवा गायकगण |

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संगीत भाइलोग : मैथिली संगीत उद्योग मे सफलताक अपन रास्ता बनेनिहार युवा गायकगण |           Ankit Kumar Roy : मैथिली संगीत पारंपरिक लोक संगीतक एक रूप अछि जे वर्तमान बिहार आ नेपालक मिथिला क्षेत्र मे उत्पन्न भेल | ई संगीतक समृद्ध आ विविध रूप अछि जे पीढ़ी दर पीढ़ी चलैत आबि रहल अछि । वर्षों मे मैथिली संगीतक विकास आ आधुनिकीकरण भेल अछि । मैथिली संगीत मे एकटा महत्वपूर्ण विकास भेल अछि नव पीढ़ीक युवा गायकक उदय जे अपन संगीतक अपन विशिष्ट शैलीक निर्माण केने छथि । हिनका लोकनि केँ म्यूजिकल भाइलोग कहल जाइत छनि, जकर मोटा-मोटी अनुवाद "संगीत भाइ" होइत छैक | म्यूजिकल भाइलोग मैथिली संगीत जगत मे अपन पहचान बनेनिहार युवा गायकक समूह अछि । म्यूजिकल भाइलोग मैथिली संगीत जगत मे अपन पहचान बनेनिहार युवा गायकक समूह अछि । जे संगीतक प्रति अपनऽ ताजा आरू अभिनव दृष्टिकोण लेल जानलऽ जाएत छैक जेकरा चलतें हुनका एगो बड़ऽ आरू समर्पित फॉलोइंग मिललऽ अछि | संगीत भाइलोगक जे विशिष्ट बनबैत अछि ओ अछि पारंपरिक मैथिली संगीतक आधुनिक वाद्ययंत्र आ तकनीकक संग मिला क ए...

जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि | विद्यापति

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जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया वासर रैनि सबासन शोभित चरण चन्‍द्रमणि चूड़ा कतओक दैत्‍य मारि मुख मेलल कतओ उगिलि कएल कूड़ा सामर बरन नयन अनुरंजित जलद जोग फुलकोका कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि लिधुर फेन उठ फोंका घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय हन-हन कर तुअ काता विद्यापति कवि तुअ पद सेवक पुत्र बिसरू जनि माता   जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया

मोक्षक विचार | खट्टर ककाक तरंग | हरिमोहन झा | Liveankit

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खट्टर कका कोल्हुआड़ में रस पेरबैत रहथि । हमरा देखि बजलाह - आबह, आबह । तोंहू एक गिलास पीबि लैह । शीतल भऽ जैबह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, शीतल त लोक अहाँक बाते सॅं भऽ जाइ अछि । अहाँ आनन्द-मूर्त्ति छि । खट्टर कका बजलाह – हौ, जीवन में और छैहे की ? आनन्द ली और दी । एक हमरे सन व्यक्ति बहुत पहिने कहि चुकल छथि - यावज्जीवेत् सुखं जीवेत ॠणं कृत्वा घृतं पिबेत् । रस पीबी ओ रस बाजी । यावत ई देह छथि तावत् संसारक रस लऽ ली फेर त- बहुरि एहि जग जन्म नाहीं, नाहिं ऎसो देह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, परन्तु अपना देशक बड़का-बड़का दर्शनकार त दोसरे रंग कहै छथि । खट्टर कका कैं हॅंसी लागि गेलैन्ह। बजलाह – हौ, दर्शनकार सभक आँखि पर तेहन मोक्षक मकड़ जाला लागल छैन्ह जे ओ संसार कैं देखिऎ नहिं सकैत छथि । हम - खट्टर कका, जीवनक चरम लक्ष्य थीक मोक्ष। तकरा विषय में अहाँ ए ना बजैत छी ? खट्टर कका एक बाल्टी रस छनैत कहय लगलाह- यैह चरम लक्ष्य त हमरा लोकनि कैं लाहेब कऽ देलक। 'ई जीवन दुःखमय। संसार दुःखमय।' जे केओ ऎलाह से यैह विरहा गबैत। 'एहि संसार सॅं कोना छुटकारा हैत?’ जेना ई संसार जेल हो! आन आन देशक लोक एहि संसार कैं क...

गीताक मर्म / खट्टर ककाक तरंग / हरिमोहन झा / Liveankit

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  खट्टर कका भांग घोंटैत रहथि । हमरा हाथ में गीताक पुस्तक देखि बजलाह - आब तों गीताक पाठ करैत छह ? हम कहलिऎन्ह – हॅं ! खट्टर कका बजलाह – हौ बाबू, तखन आब तोरा सॅं फराके रहक चाही । हम चकित होइत कहलिऎन्ह - से किऎक, खट्टर कका ? खट्टर कका भांग रगरैत बजलाह – हौ, पहिने अर्जुन कैं बड़-जेठ क विचार रहैन्ह । बाप-पित्ती पर कोना हाथ छोड़ब ? परन्तु गीताक आसव पान कय तेहन बुत्त भऽ गेलाह जे वृद्ध पितामह क छाती कैं विदीर्ण कय देलन्हि । तैं हमरो डर होइत अछि । कदाचित कोनो आरि-धूर लऽ कऽ तोरा सॅं तकरार भऽ जाय । और तोंहू अर्जुन जकाँ ज्ञानी भऽ विचारह जे - नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । “ककाजीक आत्मा कैं त शस्त्र काटिए ने सकैत छैन्ह, एक गडांँस कसि कऽ लगा दिऎन्ह ।" और ओम्हर तोहर काकी घेओना पसारथुन्ह त बुझाबय लगबहुन जे -  वासांसि जीर्णानि यथा विहाय  नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ “ककाजीक चेला बदलि गेलैन्ह, नव देह भेटलैन्ह अछि, अहाँ खुशी मनाउ,सोहर गाउ, कनैत छी किऎक ?” `````` हौ, बाबू ! यदि गामक युवक दल कैं...

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