कन्याक जीवन | बीछल कथा | हरिमोहन झा | Liveankit
-"हे औ पाहुन! देखू, फेर हमरा दस पड़ल। आब अहाँक गोटी कटा गेल।" -"ए तित्तिर दाइ! कन्ना नहि करू। अहाँकें दू खुदरा पड़ल अछि।" -"नहि! दस पड़ल अछि। एकटा कौड़ी चित्त छैक से नहि सुझै अछि?" -"नहि! दू टा कौड़ी चित्त छल। अहाँ कंगनासॅं घुसका देलिऎक ताहिसॅं एकटा पट भऽ गेल। एना बेइमानी नहि करू।" -"बेइमानी त अहाँ करैत छी। हारय लगै छी त एहिना कन्ना करऽ लगै छी। जाउ, आब अहाँसॅं नहि खेलाएब।" ई पचीसीक झगड़ा चलिते छल कि धप्प दऽ गाछीमे एकटा लाल सिनुरिया आम खसलैक। तित्तिर दाइ दौड़लीह। और हमहूँ त आखिर दसे वर्षक रही। आम लूटय लेल नहि दौड़ितहुँ त फेर बाल्यावस्था कहौलकैक की? फल ई भेल जे दुनू गोटे एके बेर ओहि आम लग जा कऽ खसलहुँ। तित्तिर ओहि आमकें बकबका कऽ मुट्ठीमे धैने! और हम तित्तिरक मुट्ठीकें अपना मुट्ठीमे कसने! केओ छोड़य लेल तैयार नहि। तित्तिर बजलीह-"हे औ पाहुन! ई आम हम पौलहुँ अछि । अहाँ हमर मुट्ठी छोड़ि दियऽ, नहि त आब हम दाँते काटब से कहि दैत छी।" हम जा जबाब दिऎन्ह ता तित्तिरदाइ ततेक जोरसॅं दाँत काटि लेलन्हि जे हम किकिया उठलहुँ और बक्क दऽ हाथ छोड़ि देलिऎन्ह। त...