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गौरा तोर अंगना / विद्यापति

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  गौरा तोर अंगना। बर अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करे हुलना। दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥ हे गौरा तोर... कार्तिक गणपति दुई चेंगना। एक चढथि मोर एक मुसना॥ हे गौर तोर... पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना। सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥ हे गौरा तोर... खेती न पथारि शिव गुजर कोना। मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥ हे गौरा तोर । भनहि विद्यापति सुनु उगना। दरिद्र हरन करू धएल सरना॥ रचना : विद्यापति  

पिया मोर बालक हम तरूणी गे / Music Lyrics / Liveankit

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पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया लेल कोरा में चलल बज़ार पिया लेल कोरा में चलल बज़ार हटिया के लोग पूछे हटिया के लोग पूछे केला रूप तोहार नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय बिधना लिखल छल बिधना लिखल छल बाल मोह हमर पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पहिरल सखी एक दछिनक चीर पहिरल सखी एक दछिनक चीर पिया के देखैत भेल पिया के देखैत भेल दगड सरीर बाट रे बटोहिया के बाट रे बटोहिया के तोहि मोर भाई हमरो बाबाजी के कहब बुझाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय दूध पिया क दूध पिया क पोस्ता जमाई नहीं मोर बरद गोला नहीं मोर बरद गोला नहीं धेनु गाय कौने जुगुत सखि कौने जुगुत सखि पोसब जमाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे

जागू जागू मैथिल समाज / मैथिलि कविता /आनन्द झा न्यायाचार्य |

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जागू जागू मैथिल समाज। सन्देश सत्य अछि निकट आज॥ तन्द्रालस दिन बिताओल अनेक, तैँ लै अयलहुँ अछि सलिन्ल सेक जा’ जागब नहि ता रहब ढारि, धु्रव कान बीच ई सत्य-वारि। हे युवक सिंह दीअऽ दहाड़ जे गूँजि उठै घर, वन, पहाड़। मिथ्या पशु लै बनु बलि कृपाण, पाबै जहिसँ निज देश त्राण। देशक शासक करइछ अनीति, समुचित तकरासँ नहि पिरीति। झंझानिल सम बनि वेगवान, झट तोडू खलशाखीक मान। नवनव समुदय लै सहसपाद बनि, नाशू अहँ तामस विषाद। देशक उत्थानक बनु प्रतीक, बनि सत्यनिष्ठ ओ विनिर्भीक। फूकू नादक बल शंखनाद, छपि जाय जतय नाना विवाद। देशक गौरवपर राखि ध्यान, करु उदय हेतु नवनव विधान। निश्चय साहस नहि विफल हैत माँ मैथिलीक गुन जगतगैत।                      

गामक लोक / मैथिलि कविता / उदयचन्द्र झा ‘विनोद’

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अपियारी के माछ जकाँ अछि गामक लोक सहियौने अछि सहत नित्य मारए बेरोक अश्रुक द्रवणशक्ति नहि बाँचल नीवी बन्द हत्या कएलक क्यो निरीह गौआँ पैबन्द। पूर्वक मुखिया ताड़ जकाँ छथि गुमसुम ठाढ़ सम्प्रति प्रमुख गना रहला अछि अपन-पराड़ कुष्टिआएल शब्दक नारा नहि होइ समर्थ। अनुनय-विनय-प्रयास-प्रतीक्षा भ’ गेल व्यर्थ फगुआ-सुकराती आशंकित हिंसा-राज सौमनस्य-दर्शन अछि खेदल गेल स्वराज सज्जनताक मखौल उड़ाबए बैसल गिद्ध बोलवा डाकू भ’ गेल राताराति प्रसिद्ध। हैवानी सम्मानित भ’ चढ़ि रहल मचान उपभोगक सामान जुटाबए पाछाँ प्राण सार्थ नहि संवाद ध्येय धूमिल नेताक बड़ पूजथि दुलहिन भावी छनि जरि जएबाक। कुसुम नगरमे कुलिशक खोलल गेल दोकान कर्तव्यक नित पाठ पढ़ाबथि निपट अजान के कहलक ककरा कहलक से क्यो नहि पूछ उनटा बहए बसात करै-ए राज उलूक। शीलक ठोकल दाम वकीलक चलती भेल बढ़ल मामिला आर गाम गंजनमे गेल बाँटल गेल रिलिफ विभाजन तहिनाँ भेल आधा उचिते लोकक खाता राखल गेल। झूठक आलंबन आवश्यक जीवन लेल आएल जवानी पानि जकाँ लगले चल गेल प्रगतिक चर्चा खूब अवगतिक भेल अभाव आइ होइछ आलोचित गाँधी-सत्य-स्वभाव। अनुपातक खेती करैत अछि गामक लोक ककरो पाछाँ ध’ उढ़रै अ...

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