शास्त्रक वचन \ खट्टर कका कs तरंग \ हरिमोहन झा \ Liveabhinash
ओहि दिन खट्टर कका सॅं शास्त्रचर्चा छिडि गेल । बात ई भेलैक जे खट्टर कका चार छरबैत रहथि । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, भदबे में छवनी करबैत छिऎक ? खट्टर कका बजलाह – हौ, अनदिना जन नहिं भेटैत अछि । तैं घरहट कऽ काज हम भदबे में करा लैत छी । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, अहाँ शास्त्र क वचन नहिं मानैत छिऎक ? खट्टर कका बजलाह - कोन-कोन वचन मानय कहैत छह ? हम कहलिऎन्ह - शास्त्र में जे किछु लिखल छैक से हमरा लोकनिक कल्याणार्थे । सभ में किछु ने किछु अभिप्राय भरल छैक । मनु, याज्ञवल्क्य, पराशर आदि की एकोटा वचन निरर्थक लिखने छथि ? खट्टर कका मुस्कुरा उठलाह । बजलाह - तखन हम एकटा पुछैत छिऔह । मनु क वचन छैन्ह - न दिविन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः । जौं आकाश में इन्द्रधनुष देखी त दोसरा कैं नहिं देखाबी । एहि मे कोन अभिप्राय छैक ? और उदाहरण लैह । स्मृति समुच्चय में लिखैत छैक - स्वगृहे प्राक्शिराः स्वप्यात् , श्वाशुरे दक्षिणाशिराः । प्रत्यक्शिराः प्रबासे च न कदाचिदुदङ्ग मुखः ॥ अर्थात अपना घर में पूब मूहें सूती । सासुर में दक्षिण मूहें सूती । परद...