आयुर्वेद | चतुर्थ अध्याय -- खट्टर कका क तरंग ( हरिमोहन झा )
Post Via: Abhinash Shandilya खट्टर कका भाङ्ग धोइत रहथि। हमरा संग एक व्यक्ति कैं देखि पुछ्लथिन्ह - ई के थिकाह ? हम कहलिएन्ह - ई थिकाह वैद्यजी । खट्टर कका हुनका हाथ में एक पुस्तक देखि पुछलथिन्ह – ई कोन पोथी थीक ? वैद्यजी - भावप्रकाश । खट्टर कका - अहा, की सुन्दर काव्य थीक - भावप्रकाश ! वैद्यजी विस्मित होइत बजलाह - भावप्रकाश आयुर्वेदक प्रामाणिक ग्रन्थ थिकैक। तकरा अपने काव्य कहैत छिएक ? हम पुछलिऎन्ह - खट्टर कका, आहॅं। कैं भाङ्ग त ने लागल अछि । खट्टर कका भांग क पानि पसवैत बजलाह - भाङ्ग त हमरा सदिखन लगले रहैत अछि । नहिं त गोनूझा क भिन्ने बथान किएक रहैत ? हमरा त आयुर्वेदो काव्ये बुझना जाइत अछि । हम - से कोना ? खट्टर कका (वैद्य सॅं ) कहू त ज्वरक उत्पत्ति ? वैद्य - ‘ दक्षापमानसंक्रुद्धः रुद्रनिःश्वाससंभवः ' अर्थात जखन दक्ष प्रजापतिक ओहि ठाम महादेवजीक अपमान भेलैन्ह तखन जे ओ खिसियाकऽ फुफकार छोडलन्हि, ताहि फुफकार सॅं जे रोग उत्पन्न भेल सैह ज्वर थीक । खट्टर कका (हमरा सॅं) - आब कहह। कोनो डाक्टर क मगज में एहन बात आबि सकैत छैन्ह ? एही द्वारे हम आयुर्वेद कैं काव्य कहैत छिऎक । वैद्...