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Showing posts from November, 2022

गौरा तोर अंगना / विद्यापति

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  गौरा तोर अंगना। बर अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करे हुलना। दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥ हे गौरा तोर... कार्तिक गणपति दुई चेंगना। एक चढथि मोर एक मुसना॥ हे गौर तोर... पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना। सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥ हे गौरा तोर... खेती न पथारि शिव गुजर कोना। मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥ हे गौरा तोर । भनहि विद्यापति सुनु उगना। दरिद्र हरन करू धएल सरना॥ रचना : विद्यापति  

जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि | विद्यापति

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जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया वासर रैनि सबासन शोभित चरण चन्‍द्रमणि चूड़ा कतओक दैत्‍य मारि मुख मेलल कतओ उगिलि कएल कूड़ा सामर बरन नयन अनुरंजित जलद जोग फुलकोका कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि लिधुर फेन उठ फोंका घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय हन-हन कर तुअ काता विद्यापति कवि तुअ पद सेवक पुत्र बिसरू जनि माता   जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया

पिया मोर बालक हम तरूणी गे / Music Lyrics / Liveankit

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पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया लेल कोरा में चलल बज़ार पिया लेल कोरा में चलल बज़ार हटिया के लोग पूछे हटिया के लोग पूछे केला रूप तोहार नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय बिधना लिखल छल बिधना लिखल छल बाल मोह हमर पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पहिरल सखी एक दछिनक चीर पहिरल सखी एक दछिनक चीर पिया के देखैत भेल पिया के देखैत भेल दगड सरीर बाट रे बटोहिया के बाट रे बटोहिया के तोहि मोर भाई हमरो बाबाजी के कहब बुझाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय दूध पिया क दूध पिया क पोस्ता जमाई नहीं मोर बरद गोला नहीं मोर बरद गोला नहीं धेनु गाय कौने जुगुत सखि कौने जुगुत सखि पोसब जमाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे

मोक्षक विचार | खट्टर ककाक तरंग | हरिमोहन झा | Liveankit

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खट्टर कका कोल्हुआड़ में रस पेरबैत रहथि । हमरा देखि बजलाह - आबह, आबह । तोंहू एक गिलास पीबि लैह । शीतल भऽ जैबह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, शीतल त लोक अहाँक बाते सॅं भऽ जाइ अछि । अहाँ आनन्द-मूर्त्ति छि । खट्टर कका बजलाह – हौ, जीवन में और छैहे की ? आनन्द ली और दी । एक हमरे सन व्यक्ति बहुत पहिने कहि चुकल छथि - यावज्जीवेत् सुखं जीवेत ॠणं कृत्वा घृतं पिबेत् । रस पीबी ओ रस बाजी । यावत ई देह छथि तावत् संसारक रस लऽ ली फेर त- बहुरि एहि जग जन्म नाहीं, नाहिं ऎसो देह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, परन्तु अपना देशक बड़का-बड़का दर्शनकार त दोसरे रंग कहै छथि । खट्टर कका कैं हॅंसी लागि गेलैन्ह। बजलाह – हौ, दर्शनकार सभक आँखि पर तेहन मोक्षक मकड़ जाला लागल छैन्ह जे ओ संसार कैं देखिऎ नहिं सकैत छथि । हम - खट्टर कका, जीवनक चरम लक्ष्य थीक मोक्ष। तकरा विषय में अहाँ ए ना बजैत छी ? खट्टर कका एक बाल्टी रस छनैत कहय लगलाह- यैह चरम लक्ष्य त हमरा लोकनि कैं लाहेब कऽ देलक। 'ई जीवन दुःखमय। संसार दुःखमय।' जे केओ ऎलाह से यैह विरहा गबैत। 'एहि संसार सॅं कोना छुटकारा हैत?’ जेना ई संसार जेल हो! आन आन देशक लोक एहि संसार कैं क...

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