खट्टर कका कोल्हुआड़ में रस पेरबैत रहथि । हमरा देखि बजलाह - आबह, आबह । तोंहू एक गिलास पीबि लैह । शीतल भऽ जैबह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, शीतल त लोक अहाँक बाते सॅं भऽ जाइ अछि । अहाँ आनन्द-मूर्त्ति छि । खट्टर कका बजलाह – हौ, जीवन में और छैहे की ? आनन्द ली और दी । एक हमरे सन व्यक्ति बहुत पहिने कहि चुकल छथि - यावज्जीवेत् सुखं जीवेत ॠणं कृत्वा घृतं पिबेत् । रस पीबी ओ रस बाजी । यावत ई देह छथि तावत् संसारक रस लऽ ली फेर त- बहुरि एहि जग जन्म नाहीं, नाहिं ऎसो देह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, परन्तु अपना देशक बड़का-बड़का दर्शनकार त दोसरे रंग कहै छथि । खट्टर कका कैं हॅंसी लागि गेलैन्ह। बजलाह – हौ, दर्शनकार सभक आँखि पर तेहन मोक्षक मकड़ जाला लागल छैन्ह जे ओ संसार कैं देखिऎ नहिं सकैत छथि । हम - खट्टर कका, जीवनक चरम लक्ष्य थीक मोक्ष। तकरा विषय में अहाँ ए ना बजैत छी ? खट्टर कका एक बाल्टी रस छनैत कहय लगलाह- यैह चरम लक्ष्य त हमरा लोकनि कैं लाहेब कऽ देलक। 'ई जीवन दुःखमय। संसार दुःखमय।' जे केओ ऎलाह से यैह विरहा गबैत। 'एहि संसार सॅं कोना छुटकारा हैत?’ जेना ई संसार जेल हो! आन आन देशक लोक एहि संसार कैं क...