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हिन्दू नव वर्ष | 2070

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           Ankit Kumar Roy : हिन्दू नव वर्ष जेकरा "विक्रम संवत" के नाम स सेहो जानल जाएय छै, भारत आरू दुनियाक अन्य भाग म हिन्दू समुदाय द्वारा बहुत उत्साह आरू हर्षक साथ मनाबल जाएत अछि । हिन्दू कैलेंडर चन्द्र चक्रक पालन करैत चि, जेकर मतलब अछि जे हर सालक शुरुआत निश्चित नै होय छै बल्कि साल दर साल अलग अलग होएत छैक । हिन्दू चन्द्र पंचांगक अनुसार चैत्र मासक पहिल दिन नव वर्ष शुरू होइत अछि, जे प्रायः मार्चक अंत या अप्रैलक प्रारंभ म होइत अछि । हिन्दू नव वर्ष नव शुरुआत आ नव शुरुआत के समय अछि, कियाक त लोक आशावाद आ आशाक संग आगामी सालक इंतजार करैत छथि। ई पारिवारिक जुटान, उत्सव, आ धार्मिक अनुष्ठानक समय छै । ई दिन संस्कार, प्रार्थना, आरू उत्सवक साथ मनाबल जाएत चि, जे क्षेत्रक क्षेत्र आरू समुदायक अनुसार अलग अलग होएत अछि । हिन्दू नव वर्षक एगो महत्वपूर्ण उत्सव महाराष्ट्र राज्य म होय छै, जहां एकरा "गुड़ी पदवा" के नाम स जानल जाएत अछि । एहि दिन लोक घरक बाहर बाँसक खंभा पर "गुड़ी" झंडा जे फूल सँ सजल चमकैत पीयर वा केसरक कपड़ा होइत अछि, फहरबैत छथि । ई झंडा आबै वाला सालक लेल शुभक...

कन्याक जीवन | बीछल कथा | हरिमोहन झा | Liveankit

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  -"हे औ पाहुन! देखू, फेर हमरा दस पड़ल। आब अहाँक गोटी कटा गेल।" -"ए तित्तिर दाइ! कन्ना नहि करू। अहाँकें दू खुदरा पड़ल अछि।" -"नहि! दस पड़ल अछि। एकटा कौड़ी चित्त छैक से नहि सुझै अछि?" -"नहि! दू टा कौड़ी चित्त छल। अहाँ कंगनासॅं घुसका देलिऎक ताहिसॅं एकटा पट भऽ गेल। एना बेइमानी नहि करू।" -"बेइमानी त अहाँ करैत छी। हारय लगै छी त एहिना कन्ना करऽ लगै छी। जाउ, आब अहाँसॅं नहि खेलाएब।" ई पचीसीक झगड़ा चलिते छल कि धप्प दऽ गाछीमे एकटा लाल सिनुरिया आम खसलैक। तित्तिर दाइ दौड़लीह। और हमहूँ त आखिर दसे वर्षक रही। आम लूटय लेल नहि दौड़ितहुँ त फेर बाल्यावस्था कहौलकैक की? फल ई भेल जे दुनू गोटे एके बेर ओहि आम लग जा कऽ खसलहुँ। तित्तिर ओहि आमकें बकबका कऽ मुट्ठीमे धैने! और हम तित्तिरक मुट्ठीकें अपना मुट्ठीमे कसने! केओ छोड़य लेल तैयार नहि। तित्तिर बजलीह-"हे औ पाहुन! ई आम हम पौलहुँ अछि । अहाँ हमर मुट्ठी छोड़ि दियऽ, नहि त आब हम दाँते काटब से कहि दैत छी।" हम जा जबाब दिऎन्ह ता तित्तिरदाइ ततेक जोरसॅं दाँत काटि लेलन्हि जे हम किकिया उठलहुँ और बक्क दऽ हाथ छोड़ि देलिऎन्ह। त...

गौरा तोर अंगना / विद्यापति

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  गौरा तोर अंगना। बर अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करे हुलना। दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना॥ हे गौरा तोर... कार्तिक गणपति दुई चेंगना। एक चढथि मोर एक मुसना॥ हे गौर तोर... पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना। सम्पति मध्य देखल भांग घोटना॥ हे गौरा तोर... खेती न पथारि शिव गुजर कोना। मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना॥ हे गौरा तोर । भनहि विद्यापति सुनु उगना। दरिद्र हरन करू धएल सरना॥ रचना : विद्यापति  

जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि | विद्यापति

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जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया वासर रैनि सबासन शोभित चरण चन्‍द्रमणि चूड़ा कतओक दैत्‍य मारि मुख मेलल कतओ उगिलि कएल कूड़ा सामर बरन नयन अनुरंजित जलद जोग फुलकोका कट-कट विकट ओठ पुट पांडरि लिधुर फेन उठ फोंका घन-घन-घनय घुंघरू कत बाजय हन-हन कर तुअ काता विद्यापति कवि तुअ पद सेवक पुत्र बिसरू जनि माता   जय-जय भै‍रवि असुर भयाउनि पशुपति भामिनी माया सहज सुमति वर दियउ गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया

पिया मोर बालक हम तरूणी गे / Music Lyrics / Liveankit

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पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया लेल कोरा में चलल बज़ार पिया लेल कोरा में चलल बज़ार हटिया के लोग पूछे हटिया के लोग पूछे केला रूप तोहार नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय नहीं मोर देवर नहीं छोटी भाय बिधना लिखल छल बिधना लिखल छल बाल मोह हमर पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पहिरल सखी एक दछिनक चीर पहिरल सखी एक दछिनक चीर पिया के देखैत भेल पिया के देखैत भेल दगड सरीर बाट रे बटोहिया के बाट रे बटोहिया के तोहि मोर भाई हमरो बाबाजी के कहब बुझाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय बेचता बरद गोला किनता धेनु गाय दूध पिया क दूध पिया क पोस्ता जमाई नहीं मोर बरद गोला नहीं मोर बरद गोला नहीं धेनु गाय कौने जुगुत सखि कौने जुगुत सखि पोसब जमाई पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे पिया मोर बालक हम तरूणी गे कोन तप चुकल भेलहुँ जननि गे

मोक्षक विचार | खट्टर ककाक तरंग | हरिमोहन झा | Liveankit

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खट्टर कका कोल्हुआड़ में रस पेरबैत रहथि । हमरा देखि बजलाह - आबह, आबह । तोंहू एक गिलास पीबि लैह । शीतल भऽ जैबह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, शीतल त लोक अहाँक बाते सॅं भऽ जाइ अछि । अहाँ आनन्द-मूर्त्ति छि । खट्टर कका बजलाह – हौ, जीवन में और छैहे की ? आनन्द ली और दी । एक हमरे सन व्यक्ति बहुत पहिने कहि चुकल छथि - यावज्जीवेत् सुखं जीवेत ॠणं कृत्वा घृतं पिबेत् । रस पीबी ओ रस बाजी । यावत ई देह छथि तावत् संसारक रस लऽ ली फेर त- बहुरि एहि जग जन्म नाहीं, नाहिं ऎसो देह । हम कहलिऎन्ह - खट्टर कका, परन्तु अपना देशक बड़का-बड़का दर्शनकार त दोसरे रंग कहै छथि । खट्टर कका कैं हॅंसी लागि गेलैन्ह। बजलाह – हौ, दर्शनकार सभक आँखि पर तेहन मोक्षक मकड़ जाला लागल छैन्ह जे ओ संसार कैं देखिऎ नहिं सकैत छथि । हम - खट्टर कका, जीवनक चरम लक्ष्य थीक मोक्ष। तकरा विषय में अहाँ ए ना बजैत छी ? खट्टर कका एक बाल्टी रस छनैत कहय लगलाह- यैह चरम लक्ष्य त हमरा लोकनि कैं लाहेब कऽ देलक। 'ई जीवन दुःखमय। संसार दुःखमय।' जे केओ ऎलाह से यैह विरहा गबैत। 'एहि संसार सॅं कोना छुटकारा हैत?’ जेना ई संसार जेल हो! आन आन देशक लोक एहि संसार कैं क...

गीताक मर्म / खट्टर ककाक तरंग / हरिमोहन झा / Liveankit

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  खट्टर कका भांग घोंटैत रहथि । हमरा हाथ में गीताक पुस्तक देखि बजलाह - आब तों गीताक पाठ करैत छह ? हम कहलिऎन्ह – हॅं ! खट्टर कका बजलाह – हौ बाबू, तखन आब तोरा सॅं फराके रहक चाही । हम चकित होइत कहलिऎन्ह - से किऎक, खट्टर कका ? खट्टर कका भांग रगरैत बजलाह – हौ, पहिने अर्जुन कैं बड़-जेठ क विचार रहैन्ह । बाप-पित्ती पर कोना हाथ छोड़ब ? परन्तु गीताक आसव पान कय तेहन बुत्त भऽ गेलाह जे वृद्ध पितामह क छाती कैं विदीर्ण कय देलन्हि । तैं हमरो डर होइत अछि । कदाचित कोनो आरि-धूर लऽ कऽ तोरा सॅं तकरार भऽ जाय । और तोंहू अर्जुन जकाँ ज्ञानी भऽ विचारह जे - नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । “ककाजीक आत्मा कैं त शस्त्र काटिए ने सकैत छैन्ह, एक गडांँस कसि कऽ लगा दिऎन्ह ।" और ओम्हर तोहर काकी घेओना पसारथुन्ह त बुझाबय लगबहुन जे -  वासांसि जीर्णानि यथा विहाय  नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ “ककाजीक चेला बदलि गेलैन्ह, नव देह भेटलैन्ह अछि, अहाँ खुशी मनाउ,सोहर गाउ, कनैत छी किऎक ?” `````` हौ, बाबू ! यदि गामक युवक दल कैं...

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