मैथिली लघुकथा ‘ पुत्रमोह ‘ : नन्दलाल आचार्य

 


● मैथिली लघुकथा : पुत्रमोह

— नन्दलाल आचार्य 


‘ यौ सुनू न । हमर नुन्नु-बेटा तँ हमरे दिस भेल । अहाँक धन किछु नइँ काज लागल । हमर मातृत्व आगु अहाँक बनौटी दुलार घाँस चरऽ गेल।’

मोबाइलसँ पतिदेवकेँ खोचकारैत हम चिकरल छलौँ । एक दशक उमेर पहुँच गेल बेटाकेँ काखमे राखि हम नैहराक बाट नापि लएने छलौँ। ओ नइँ मानलाक कारण दोसरे सिटक झाल दिस बैठऽ लेल बाध्य भेलौँ । यात्रुबसमे मात्र पाँच गोटे यात्रारत छलौँ।

हमर बातसँ ओ चुप्पी लधने छलाह । एक शब्द हुनकर ठोरसँ नइँ फुटि रहल छल । मात्र एकाग्र भकऽ सुनि रहल छलाह। हम बस एकभगाह बाजि रहल छलौँ – “
– अहाँक कनियाँ धन मात्र होए; सजीव नइँ होए ।
– अहाँक आँखि पाय मात्र चिन्हए; दोसर चीज नइँ चिन्हए ।
– अहाँ बोराभरिकऽ धन कमाउ आ जिनगीभरि धनकेँ देखिकऽ रमाउ । धन लोकक मनकेँ आन्हर बना दै छै से भाव कहियो बोध नइँ हुअए । “

..एना हम हुनका सरापिकऽ छटपटाइत करेजकेँ ठण्डाबैत छलौँ । ओ हमरा नइँ अज्ञात रखैलिकेँ अदृष्य धनचालक बनेलाक कारण भितरे-भितर हम जरि रहल छलौँ।

हम भनभन कएलापर ओ कहने छलनि; ‘अहाँ जिनगीसँ चलि जाउ । मनमौजी पाय लिय आ झट्ट दऽ भागू ।’

त्यागपत्रमे सही कएला बापत पचास हजार देने छलनि। उहए लकऽ नैहराक अधेर विन्देशर सङ्ग बाँकी जिनगीक बन्हन बान्हऽ जाइत छलौँ ।

धनसँ गरिव भेलोपर मनसँ धनिक छलाह विन्देशर । छाक टारऽ लेल सेहो हुनका काम-काजमे भर पड़बाक बाध्यता छल। ई बात जानितो हम जिनगीकेँ आओर गहीर मोड़दिस धकलैत रहि गेलौँ।

‘पपा सत्र हजारकऽ साइकल किनि दै वला छलखिन । हमरा घर पहुँचा दिए। बरू साइकल किनि देलापर अहीँ सङ्ग रहब माँ।’

बेटाक बात हमरा आओर गम्भीर आ संवेदनशील बनेलक। आब तँ हमर बात्सल्यप्रेमप्रति प्रश्न चिन्ह ठाढ़ भगेल। अपन निर्धन जिनगीकेँ बुझि आँखि नोरा गेल ।

हमर चुप्पीकेँ चिरैत ओकर बोली फूटल छल ; ‘हमरा अहीँ सङ्ग जँ रहऽ पड़तै माँ तँ साइकल किनि दिए तबेटा रहब।’

– अनुवाद : अंकित  कुमार रॉय

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